औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

Labels

Tuesday, 10 December 2013

पुस्तक समीक्षा : अंधे की आंख (उपन्यास)

श्री राजेन्द्र कुमार रस्तोगी कृत 517 पृष्ठीय वृहद् उपन्यास ‘अंधे की आँख’ इस वक़्त मेरे हाथ में है | नायक चंदर के जीवन पर केन्द्रित इस उपन्यास में लेखक की गहन अंतर्व्यथा उभर कर सामने आती है | यहाँ पर चंदर हमारे समाज के अत्यंत सीमित साधनों-संसाधनों के बीच जी रहे तमाम स्थितियों-परिस्थितियों से जूझते हुए एक आम आदमी का प्रतीक बन जाता है | चंदर की सारी समस्याएं हमसे व हमारे आसपास के सामाजिक वातावरण से जुड़ी हुई हैं | उपन्यास को पढ़ते हुए पाठक उससे जुड़ाव महसूस करता है |
उपन्यास की पूरी कथावस्तु का प्रस्तुतिकरण प्रभावशाली है लेकिन कहीं कहीं पर घटनाओं को अनावश्यक लम्बाई दे दी गयी है जिससे बचा जा सकता था | उपन्यास इतना वृहद् है कि प्रथमतः मुझे खुद इसकी समीक्षा लिख पाना एक चुनौती लगा | हालांकि लेखक ने तमाम घटनाओं व जीवन-जगत की अत्यंत छोटी-छोटी सी लगने वाली बातों को भी अच्छे शब्द दिए हैं | उपन्यास चंदर के निराशाभरे वक्तव्य से शुरू होकर आशा रुपी उजाले के सुखद अंत की ओर बढ़ता है | इसी उपन्यास के कुछ अच्छे अंश दृष्टव्य हैं-
‘इतना कुछ होते-पाते त्रिभुवन व्यापिनी जैसी अंधियारी के चलते रुद्ध और असहज हो गयी थी चंदर की जीवन गति |’ (पृष्ठ-35)
‘गत जीवन का अप्रिय और दुखद पहलू ही रूप बदल-बदलकर आ उपस्थित होता-मानस चक्षुओं के समक्ष....|’ (पृष्ठ-71)
‘इस भांति चंदर का वर्तमान जीवन, सामान्य जीवन नहीं रहा, सच पूछो तो वह अनंत रात्रि के बीच कभी ख़त्म न होने वाला स्वप्न सरीखा ही बनकर रह गया |’ (पृष्ठ-72)
‘अकथ्य पीड़ा.......
पीड़ा सहते-सहते चंदर का ध्यान पीड़ा के कारणों की ओर गया,
हाय-रे शौक....!
वाह-रे शौक़ीन...!!
जवाब नहीं तेरा....!
चढ़ बने तो तेरा कर देता है कमाल...
फाड़ कर धोती, बना लेता है-रूमाल !’ (पृष्ठ-89)
कहीं कहीं लेखक ने काव्यात्मक लहजे का भी प्रयोग किया है, देखें-
‘....आए दिन अंधड़...
चली पुरवाई..../और रहने लगा अम्बर....
बादलों की चुहलकदमी..../ कहीं धूप तो कहीं छाया...
हड़कल और कभी हडकंप..../ पूर्व-सूचना वर्षा के आगमन की...
ठंडी बयार-फुहार..../ कभी रिमझिम तो कभी झिर-झिर...
चसक-घुटने में.../ जोड़-तोड़ में दर्द और अकड़न...
गर्जन-तर्जन और तड़तड़-घड़घड़...’ (पृष्ठ-49)
जब ज्ञानवती लीलावती का थैला खोलती है तो उसमें रखी हुई चीज़ें उसके बचपन के सपनों की भावुक आवृत्तियाँ होतीं हैं, जिन्हें देखकर ज्ञानवती व चंदर अवाक रह जाते हैं | इस पूरे घटनाक्रम का सजीव चित्रण लेखक ने बखूबी किया है-
‘पके अधपके अमरुद...पिसे नमक मिर्च की पुड़िया..अध चकोतरे में चमकती चार-पांच खापें.../कमलगट्टे के चार-पांच सम्पुट और खिले-अधखिले उसके फूल- कुम्हलाए हुए...लाल इमली के चोड़पे...कांच के रंग-बिरंगे कंचे-गोलियां...रंग उबके तोता-चिरइया, कुत्ता-खरगोश जैसे मिट्टी के खिलौने...पुराना एक मुखौटा-शेर के मुंह वाला...इसके अलावा गुड़िये-गुड्डे...पुराने कपड़े-गुदड़ आदि इत्यादि जाने क्या न क्या उसके सिन्दारे में समाई हुई....’ (पृष्ठ-508-09)
उपन्यास के अन्दर नायक चंदर के माध्यम से लेखक का जीवन के प्रति नज़रिया स्पष्ट होता है | इस जीवन-दर्शन को अपनाकर कोई भी अपना जीवन सुखी बना सकता है-
‘संसार में सच्चे अर्थों में दुःखी कौन...?
शिष्ट सम्मत शब्दों में इसका उत्तर यह होना चाहिए :
अपने को दुखी और दूसरों को सुखी समझने वाला ही वास्तव में दुःखी है |’ (पृष्ठ- 159-60)
‘दुःख, जब अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है तो दुःखी, दुःख से परे हो जाता है |’ (पृष्ठ-273)
‘आदमी, यदि आदमी की जिंदगी जीना चाहता है तो आवश्यक होगा कि वह अपने काम के प्रति ईमानदार रहे, साथ ही पुरुषार्थी बना रहकर, होशियारी के साथ संघर्ष करता रहे |’ (पृष्ठ-240)
पल-पल बदलते रिश्तों, मूल्यों और मानवीय प्रवृत्तियों पर लेखक द्वारा की गयी बेबाक टिप्पणियां पाठक को अन्दर तक झकझोर देतीं हैं | यहाँ पर पाठक परम्परागत सामाजिक ढांचे के प्रति नए सिरे से सोचने के लिए विवश हो जाता है और उपन्यास का लेखक अपने अभीष्टपूर्ति में सफल सिद्ध होता है |
पूरे उपन्यास में काव्यात्मक भाषा का प्रयोग किया गया है | कथोपकथन संक्षिप्त परन्तु प्रवाहपूर्ण है | कथावस्तु छोटी है व पूरे घटनाक्रम का जाल नायक चंदर के मानसिक अंतर्द्वंद्व के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिससे उपन्यास की कहानी काफी धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ती है |
उपन्यास की कथा अपने समानांतर कई सामाजिक समस्याओं को रेखांकित करते हुए भी चलती है जिसके आखिर में वर्तमान स्त्री-विमर्श की संक्षिप्त समीक्षा भी है |
लेखक के परिचय को पढ़ने पर पता चलता है कि उसने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की है | इस लिहाज़ से उनका शब्दभंडार व साहित्य की भाषा शैली पर अधिकार उनकी मौलिक लेखकीय प्रतिभा, गहन स्वाध्याय एवं अनुशीलन का प्रतिफल है | सृजनपथ आपके निरंतर बढ़ते क़दमों का साक्षी होता रहे, मेरी यही शुभकामना है !

समीक्ष्य पुस्तक : 'अंधे की आंख' (उपन्यास)
लेखक- राजेन्द्र कुमार रस्तोगी, बरेली (उ.प्र.)
पृष्ठ-517   मूल्य-150/-

समीक्षक- राहुल देव, सीतापुर |

0 comments:

Post a Comment