औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Friday, 30 March 2012



यूँ तो कितना कुछ
दफन हो जाता है मुझ में,
एक अँधेरा गहरा कुआँ
अनगिनत लाशों से भरा,
बस, कभी-कभार
बाहर निकलती हैं
चंद मुस्काने...

चंद अल्फाज़..
इक खोखली सी हँसी
फिर घंटो तक फैली
गमगीन खामोशी......

सब कुछ कितनी
आसानी से छुप जाता है
मेरे धीर-गंभीर,शांत, कठोर
और अभेद्य आवरण में,
कोई नहीं देख पाता
मेरे यायावर मन को
जो सदियों से भटक रहा है
एक अनजानी तलाश में...

मेरे अंदर हिलोरे लेते
समन्दर पर
मैं बड़ी सहजता से
बाँध देती हूँ
विचारों का इस्पाती पुल
जिसे पार कर
एक भी बूँद पहुँच नहीं पाती
पलकों के किनारों तक..

सब्जी काटते समय
मेरे अँगूठे पर पड़े
चाकू के निशान तो
देख लेते हैं सभी
पर मेरे अंतस पर पड़े
गहरे घावों को
मैं छुपा लेती हूँ
सुरमई काजल और
किनखाब की कश्मीरी साड़ियों में,
सब कुछ चलता रहता है
सरल,सपाट,यंत्रवत..

पर जब कभी उठते हैं
ज्वार-भाटे
कुछ बूँदें बना ही लेती हैं
रास्ता बाहर निकलने का
दाँत भींचकर मैं
रोक लेती हूँ
इस प्रवाह को
मन होता है
जोर-जोर से चीखूँ...चिल्लाऊँ...रोऊँ...

मेरे अन्दर धधकते लावा को
बाहर उँडेल दूँ
पर मैं तो ज्वालामुखी के
मुहाने पर बैठी
कर रही हूँ इंतजार
एक विस्फोट का
जिस दिन ज्वालामुखी फटेगा
मैं चिथड़े-चिथड़े होकर
बिखर जाऊँगी
हवा में फैल जाएँगी
चंद मुस्काने...
चंद अल्फाज़..
इक खोखली सी हँसी
और फिर वही घंटो तक फैली
गमगीन खामोशी.....
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डॉ. मालिनी गौतम

Monday, 5 March 2012

बन्धुओँ! होली आने वाली है!


आजकल के त्यौहारोँ मेँ वह उल्लास कहाँ है
जो ज्यादा नहीँ बल्कि 20-25 साल पहले था।
वर्तमान मेँ अधिकतर पर्व उपेक्षित होते जा रहे हैँ
मोबाइल जिन्दगी चन्द शब्दोँ तक सिमट कर रह गयी है
इसने हर एक मौका छीन लिया है हमसे
मिलने मिलाने का समय न जाने कहाँ चला गया है,
हम सब एक औपचारिक जिन्दगी जी रहे हैँ
चुपचाप अपने मेँ लस्त हैँ
विभिन्न परेशानियोँ से त्रस्त हैँ
अब किसी की कलम त्योहारोँ पर
नहीँ उठती
कहने को आज बड़े मस्त हैँ
कोई कवि होली पर कविता नहीँ लिख रहा
लेकिन होली तो होली है
हर साल आती है
और हम हर साल एक कदम आगे बढ़ जाते हैँ
ज्यादा समय नहीँ बीता है
हमेँ सोचना होगा!
थोड़ा ही सही
मुड़कर पीछे देखना होगा
जो हुआ उसे भूल जाएं
आओ सबकी खैरसल्लाह लेँ
रंगोँ मेँ डूबकर
मस्ती मेँ सराबोर हो जाएं
हम अभी इन्सान ही हैँ
समाज मेँ अभी भी रह रहेँ हैँ हम सब
सुबह का भूला शाम को घर आ जाए
तो उसे भूला नहीँ कहते
रंगोँ का त्यौहार होली आने वाली है
इसलिए थोड़ी ख़ुशी बाँटेँ
मतभेदोँ को तोड़ देँ
बनावटीपन छोड़ देँ
आओ न यार होलिकोत्सव मनाएँ..

-राहुल देव