औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Thursday, 26 January 2012

कविता और कविता -राहुल देव


कविता
फूट पड़ती है
स्वतः
अपने आप ही
जैसे किसी ठूँठ मेँ
अचानक कोँपले
फूट पड़ेँ;
या
किसी जंगल मेँ
झाड़ियोँ का
एकदम उग आना.
ठीक उसी प्रकार
कविता उग आती है
बगैर कुछ कहे
बगैर किसी भूमिका के
मेरे मस्तिष्क मेँ
और मैँ
उसे सजा लेता हूँ
कागज के
किसी पन्ने पर!
-(मरुगुलशन मेँ प्रकाशित)


Monday, 23 January 2012

जैसा तुमने कहा..


मेरे मित्रोँ ने मुझसे कहा-
कविवर!
किस वाद के पोषक हो?
अच्छा,
मानववाद के!
अरे टुटपुँजिए कवि
अपनी थकी कविताएँ
अपने पास ही रखो
निद्रा की गोलियोँ के विकल्प की संज्ञा देते हुए
व्यंग्य किया मुझ पर
मेरी कविता पर
कहने लगे-
लिखना है तो लिखो
उत्तेजक लेख
डालो मसाला
तड़का लगा के
लोगोँ से घिरे रहो
नेतागिरी करो
चढ़ जाओ मंचोँ पर
पैठ बढ़ाओ
विवादित पुस्तकेँ लिखो
रश्दी, तस्लीमा और आजाद की तरह
विवादास्पद बनो
तभी आगे बढ़ पाओगे
एकाध पुरूस्कार भी पा जाओगे
नहीँ तो घोटते रहोगे
एकाकी
कलम रात-दिन
और एक दिन
यूँ ही मर जाओगे..
-Rahul Dev

Sunday, 15 January 2012

चुनावी बयार (अवधी कविता)


लेव आइ गवा मउसम चुनाव क्यार
पम्फलेट छपय लाग
खटारा खड़बड़ाय लागीँ
अदमी दउरय लागि
बिजुरी केरे दरशन दुरलभ रहै
कि जो लुप्प-लुप्प होति रहय
अब तो जातेन नाहीँ
पानी केरी टोँटी जो आँसू बहाउत रहय
फूटि गए भाग जी के
वहव आज बोलि परी
पानिन पानी देखाय लाग
चुनावन केरे फेरि मा
दउरा चलय लाग
लेकिन चाहे जतना रमलु बनाय लेव
ई तुमरा पुराना हालु है
हमसे कछु छिपा नाहीँ
हमेँ मूरख न समझ लियो
यू अवध केरा गाँव आय
औ अवधी हमरी भासा
मुला कमपूटर हमहूँ जानित हन
गुलबलाइजेसन केरी बयार मा
लपटि गये गाँव-गाँव
फेरि-फेरि आवै
दुलरावै रोबोटवा
इंटरनेट केरे जालु मइहा फँसय सेने बचे रहे
मिट्टी हमरी सोना है
मंसा तुम्हार समझिति हन
भले अधकचरा हन
तुमेँ बड़ा खतरा है
ओटु वहै पइहै
जो परमानेन्ट रइहै
अत्ता तुम जानि लेव
चहव अगर सत्ता
तो हमका पहिचानि लेव
हमरे गाँवन मा झाँकि लेव..।

-राहुल देव  

Monday, 2 January 2012

जिँदगी और जोँक-राहुल देव


फदकता शरीर
कृशकाय जिस्म
अतृप्त जिजीविषा
लुढ़कता लुढ़कता
चलता जाता
हाथ फैलाता
माँगता कुछ खाने को
दुत्कार मिलती उसे
भगा दिया जाता
वह चुप रहता
इतने कष्टोँ मेँ जीता
बू आती उससे सभी को
बड़ा खराब लगता
उसका आना
मैँ सोचता
पता नहीँ
वह जोँक की तरह
जिन्दगी से चिपका
या जिन्दगी उससे!
(अमरकांत की कहानी 'जिँदगी और जोँक' पढ़कर)