औरों को हँसते देखो मनु हँसो और सुख पाओ, अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ ! - कामायनी

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Tuesday, 15 November 2011

आज का युवा - एक पार्श्व ये भी

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गाँव की रेतीली पगडंडी से
शहर की पथरीली सड़क तक
वीथिका वद्ध
दिशाहीन
किंतु
शाश्वत प्रयाण में अभिरत
धीरोदात्त
ठिठुरे बदन
झुलसे चेहरे
भीगी पलकें
मूक स्वर
अवरुद्ध कंठ
निराकांक्ष आँखें
मंजुलानन पर
क्षीयमाण तैज़
सर्वदा अवस्थित
दुर्दांत आक्रोश
* * *
भूख की आग में
जलता उदर
अपेक्षित राशन
किंतु
सामने थाली में
परोसा हुआ अनुशासन
यही तो है
सफल शासन
* * *
बह्यावरण
पूर्ण अथवा आंशिक शांत
किंतु
यदाकदा नेत्रों से निसृत लावा
अन्तर में
अपने विशाल भंडार का प्रमाण
कठोर परीक्षा धैर्य की
* * *
अंततः
कौन है इस अभिसंधि के पार्श्व में ?
वो, जो अपने स्वार्थों से तौलते हैं
मानवीया अस्तित्व को
वे स्वार्थ !
जो संचालित होते हैं
धन, सम्बन्ध और संस्तुतियों से
* * *
उठो 
अन्यथा यूँ ही चलेगी
गतानुगत प्रक्रिया
यूँ ही लगेंगे
तुम्हारे आयासों के मू्‌ल्य
* * *
एक प्रश्न.....
"कोइ इयत्ता ?"
संक्षिप्त उत्तर
"नहीं"
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- सुरेश ठाकुर

2 comments:

  1. बहुत ख़ूबसूरत, प्रसंशनीय, बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें.

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